‘हाय राम! कैसी मां है ये?’ 9 महीने के बच्चे को छोड़ ऑफिस में दिन भर बॉस बनती फिरती है !’
मां बनने के बाद वर्किंग महिलाओं की जिंदगी और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है। उन्हें हर दिन एक नई जंग लड़नी पड़ती है। ऑफिस के काम और घर की जिम्मेदारियों के बीच बैलेंस बनाना आसान नहीं होता। वहीं, उस पर कई बार समाज से यह ताने भी सुनने पड़ते हैं कि कैसी मां है ये, जो छोटे बच्चे को घर छोड़कर पैसे कमाने चली जाती है?’ ‘हाय राम! हाय कैसी मां हो तुम ! पूरा-पूरा दिन घर से बाहर रहती हो और सात महीने का बच्चा बिना मां के रहता है?’ “ऐसी भी कौन सी मजबूरी है भला, जो तुम अपने मासूम से बच्चे को छोड़कर दफ्तर निकल जाती हो? थोड़ा तो सोचो!’ ये सब ताने मेरे लिए कोई नए नहीं हैं। ये सिलसिला तो उसी दिन शुरू हो गया था, जब मैंने कंसीव किया था। दोस्तों और रिश्तेदारों को जैसे ही मेरी प्रेग्नेंसी की खबर लगी, हर कोई बधाई से पहले अपनी राय देने में जुट गया। जैसे- ‘अब तो बच्चा होने वाला है, भूल जाओ नौकरी- वौकरी।’ ‘बेबी के बाद तो घर ही बैठना पड़ेगा।’ ऐसा लगता था कि जैसे सब मानकर बैठे हैं कि मुझे अब अपने सपनों को ताले में बंद करके चाभी कहीं उठाकर फेंक देनी चाहिए। उस वक्त मैं इन सवालों पर ज्यादातर बस मुस्कुरा देती थी या फिर कह देती थी कि ‘हम्म… देखते हैं। ‘अभी कुछ तय नहीं किया।’ ये कहकर बात टाल देती थी। क्योंकि समाज में आज भी मां का मतलब तो यही है- त्याग, घर और बच्चा। कोई नहीं मानना चाहता कि अगर एक औरत मां बनने के साथ- साथ अपने वजूद को भी जिंदा रखना चाहती है और तो इसमे हर्ज क्या है। खैर, असली जंग तो तब शुरू हुई… ‘जब मैंने छह महीने की मैटरनिटी लीव के बाद दोबारा ऑफिस ज्वाइन किया, तो हर कदम पर बतौर मां अपनी ममता का सबूत देने से लेकर दफ्तर तक हर जगह खुद को बार-बार साबित करना पड़ रहा था।’ यूं लगता है कि हर कोई बस मेरा इम्तिहान लेने के लिए बैठा है।