बंगाल की जंग में छत्तीसगढ़ की घुसपैठ! , क्या साय मॉडल चलेगा या भूपेश फॉर्मूला होगा फेल?
• devendra kumar
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है. सियासत का तापमान चरम पर पहुंच गया है. इस बार मुकाबला सिर्फ बंगाल की पार्टियों के बीच नहीं है, बल्कि इसमें जबरन एक नया नाम जोड़ा जा रहा है, जो नाम छत्तीसगढ़ का है. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपनी-अपनी नाकामी और सियासी कमजोरियों को छुपाने के लिए अब दूसरे राज्य के “मॉडल” बेचने में जुट गई हैं.
भाजपा जहां मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नाम पर महिला सशक्तिकरण का ढोल पीट रही है, तो कांग्रेस भूपेश बघेल के पुराने और अब खारिज हो चुके फॉर्मूलों को बंगाल में री-पैक कर बेचने की कोशिश कर रही है. बड़ा सवाल यही है कि क्या बंगाल की जनता वाकई बाहर से आयात किए गए इन सियासी प्रयोगों को स्वीकार करेगी?
साय मॉडल से बदलेगा बंगाल, या सिर्फ चुनावी जुमला?
भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता देवलाल ठाकुर पूरे भरोसे से कहते हैं, छत्तीसगढ़ का असर बंगाल में दिखेगा. तर्क दिया जा रहा है कि साय सरकार ने महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत किया है और उसका संदेश बंगाल तक पहुंचेगा. लेकिन सवाल यह है कि क्या कुछ सरकारी घोषणाओं और योजनाओं के पोस्टर बंगाल की जमीनी सियासत बदल सकते हैं? हकीकत यह है कि भाजपा खुद बंगाल में अपने चेहरे और मुद्दों को लेकर उलझी हुई है, इसलिए अब वह दूसरे राज्य की बैसाखी के सहारे चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है.
कांग्रेस का भूपेश कार्ड, पुरानी बोतल में पुरानी शराब
कांग्रेस को भी बंगाल में अपनी जमीन खिसकती दिख रही है, इसलिए उसने भूपेश बघेल सरकार के दौर की योजनाओं को “मॉडल” बताकर पेश करना शुरू कर दिया है. कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर बड़े आत्मविश्वास से सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि जिस मॉडल को वह बेच रहे हैं, वही मॉडल छत्तीसगढ़ में सत्ता नहीं बचा पाई. बिजली बिल हाफ, कर्जमाफी, धान बोनस और गौठान, ये सब अब पुराने पोस्टर बन चुके हैं, जिन पर जनता पहले ही अपना फैसला सुना चुकी है